सपने

सपने मेरे नहीं आपके सपने, हमारे सपने, समाज में व्याप्त विसंगतियां मन को व्यथित करती हैं. संवेदनाओं की पृष्ठभूमि से जन्मी रचनाएँ मेरीनहीं आपकी आवाज हैं. इन आँखों में एक ख्वाब पलता है, सुकून हो हर दिल में इक दिया आश का जलता है. - शशि.
शशि का अर्थ है -- चन्द्रमा, तो चाँद सी शीतलता प्रदान करने का नाम है जिंदगी .
शब्दों की मिठास व रचना की सुवास ताउम्र अंतर्मन महकातें हैं. मेरे साथ सपनों की हसीन वादियों में आपका स्वागत है.

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Monday, June 26, 2017

क्रोध बनाम सौंदर्य -

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आज सरकारी आवास पर बड़े साहब रंग जमाए बैठे थे. वैसे तो साहब दिल के बड़े गरम मिजाज है, लेकिन आज बर्फ़ीला पानी पीकर, सर को ठंडा करने में लगे हुए है।  सौंदर्य बनाम क्रोध की जंग छिड़ी हुई है। आज महिला और पुरुष समान रूप से जागरूक है. यही एक बात है जिसपर मतभेद नहीं होते है।  कोई आरक्षण नहीं है ? कोई द्वन्द नहीं है, हर कोई  अपनी काया को सोने का पानी चढाने में लगा हुआ है। ऐसे में साहब कैसे पीछे रह सकते हैं.  हर कोई सपने में खुद को  ऐश्वर्या राय और अमिताभ बच्चन के रूप में देखता है।   साहब इस दौड़ में प्रथम आने के लिए बेक़रार है। बालों  में  बनावटी यौवन टपक रहा हैं,
किन्तु बेचारे पेट का क्या करे ? ऐसा लगता है जैसे शर्ट फाड़कर बाहर निकलने को तैयार बैठा हो. कुश्ती जोरदार है। चेहरेकी लकीरें घिस घिस कर चमकाने के प्रयास में चमड़ी दर्द से तिलमिला कर अपने रंग दिखा गयी है।
भाई इस उम्र में अगर अक्ल न झलके तो क्या करे।  अक्ल ने भी भेदभाव समाप्त करके घुटने में अपना साम्राज्य स्थापित करना प्रारम्भ कर दिया है। बेचारा घुटना दर्द की अपनी दास्तां का राग गाता रहता है।
         अब क्या करे  साहब का गुस्सा तो बस बिन बुलाया मेहमान है, जब मर्जी नाक से उड़ कर मधुमक्खी की तरह अपना डंक मारकर  लहूलुहान करता है।
शब्द भी इस डंक की भाँति अंत तक टीसते रहते है।  वैसे गुस्से में शब्द कौन से कहाँ गिरे, ज्ञात ही नहीं होता है .  बेचारे शब्दों को, बाद में दिमाग की बत्ती जलाकर ढूँढ़ना पड़ता है। अब शब्दों की जाँच नहीं हो सकती कि ज्ञात हो कौन से पितृ शब्द से जन्मा है।  भाषा क्रोध में अपना रंग रूप बदल लेती है।  क्रोध में कौन सा शब्द तीर निकलेगा,  योद्धा को भी पता नहीं होता।  आज के अखबार में सौंदर्य और क्रोध के तालमेल के बारे में सुन्दर लेख उपाय के संग दुखी हारी लोगों की प्रेरणा बना हुआ था।  ख़बरें
पढ़ते पढ़ते शर्मा जी ने साहब को सारे टिप्स  चाशनी में लपेटकर सुना दिए.

 साहब -- जवां रहने का असली राज है गुस्से को वनवास भेजना, गुस्सा आदमी को खूँखार बना देता है। आदमी को ज्ञात नहीं होता वह वह कब पशु बन गया है।  गुस्से में  उभरी हुई आकृति को यदि  बेचारा  खुद आईने में देख ले, तो डर जाये।  टेढ़ी भौहें, अग्नि उगलती से आँखे, शरीर का कम्पन के साथ  तांडव
नृत्य, ऐसी  भावभंगिमा कि जैसे ४२० का करंट पूरे शरीर में फैला देती हैं.
सौम्य मधुरता मुखमण्डल को पहचानने से भी इंकार  कर देती है। क्रोध के  कम्पन से एक बात समझ आ गयी कोई दूसरा क्रोध करे या न करें हम उसके तेवर में आने से पहले ही काँपने लगते है।  अगले को काहे
मौका दें कि वह हम पर अपना कोई तीर छोड़े।

             क्रोध की महिमा जानकार साहब  क्रोध को ऐसे गायब करने का प्रयास कर रहे हैं जैसे गधे से सिर से सींग. सारे सहकर्मी  पूरे शबाब पर थे। एक दो पिछलग्गू भी लगा लिए और साहब की चम्पी कर डाली।भगवान् जाने  ऐसा मौका मिले न मिले।  अन्य  सहकर्मी -- साहब योग करो, . व्यायाम करो.........

साहब ने बीच में ही कैंची चला दी और थोड़ा शब्दों को गम्भीरता से  चबाते हुए बोले -- क्या व्यायाम करें।बस आड़े टेढ़े मुँह बनाओ, शरीर को रबर की तरह जैसा चाहो वैसा घुमा कर आकार बनो लो।  लो भाई क्या उससे हरियाली आ जाएगी।

          फिर  खिसियाते हुए जबरन हे हे हे करने लगे, अब क्रोध तो नहीं कर सकते तो उसे दबाने के लिए शब्दों को चबा लिया, जबरजस्ती होठों - गालो को तकलीफ देकर हास्य  मुद्रा बनाने का असफल प्रयास किया। बहते पानी को कब  तक बाँधा जा सकता है ऐसा ही कुछ साहब के साथ हो रहा था।  आँखों  में  बिजली ऐसी कड़की कि आसपास का वातावरण और पत्ते पल में साफ़ हो गए।

       क्रोध के  अलग अलग अंदाज  होते है , मौन धर्मी क्रोध जिसमे मुँह  कुप्पे की फूला रहता है।  कभी आँखे अपनी कारगुजारी दिखाने हेतु तैयार  रहती है , कभी कभी मुँह फूलने की जगह पिचक जाता है तो आँखों से दरिया अपने आप बहने लगता है.  कभी कभी क्रोध की आंधी ह्रदय की सुख धरनी को दुःख  धरनी बना देती है।  चहलकदमी की सम्भावनाएं बढ़ जाती है, सुख चैन लूटकर  पाँव गतिशील हो जाते हैं व कमरे या सड़क  की लम्बाई ऐसे नापते है कि मीटर भी क्या नापेगा। शरीर की चर्बी अपने आप गलनशील हो जाती है ,  तो क्रोध एक  रामवाण इलाज है, मोटापे को दूर करने का?  यह भी किसी योग से कम नहीं है । 
  एक ऐसी दवा जो बहुत असरकारक होती है , मितभाषी खूब बोलने लगते है और  अतिभशी मौन हो जाते है या अति विध्वंशकारी हो जाते है। कोई गला फाड़कर चिल्लाता है तो कोई चिल्लाते हुए गंगा जमुना बनाता है।  कोई शब्दों को पीता है तो उसे चबाकर नयी भाषा का जन्म देता है।

 आज साहब को क्रोध का महत्व समझ आया, सोचने लगे ---   वैसे गुस्से से बड़ा  कोई बम नहीं है। गुस्सा करके हम तर्कों से बच सकते है. विचारों को नजर  अंदाज कर सकते है। कुछ न आये तो क्रोध  की आंधी सारे अंग को हिलाकर गतिशील बना देती है।  सौंदर्य योग हेतु यह योग कोई बुरा नहीं है अभी इसका महत्व लोगों को समझ नहीं आया जल्दी शोध होने और नया क्रोध पत्र बनेगा।
सोच रहा हूँ मैं भी क्रोध बाबा के नाम से अपना पंडाल शुरू कर देता हूँ।
 तब अपने दिन भी चल निकालेंगे, फिलहाल १०० करोड़ की माया को माटी में मिलने से बचाने के लिए संजीवनी ढूंढनी होगी , हास्य संजीवनी।  अब क्रोध का बखान आधा ही हुआ है  कहीं आपको तो गुस्सा नहीं आ रहा है ?
-- शशि पुरवार

Monday, June 12, 2017

पैदा होने का सबूत

 कई दिनों से विदेश घूमने की इच्छा प्रबल हो रही थी।  बेटा विदेश में था, तो सोचा हम भी विदेशी गंगा नहा लें।   सुना है विदेश जाने के लिए कई पापड़ बेलने पड़ते हैं। तरह तरह के रंग बिरंगे कार्ड लगाकर टिकिट कटता है। पासपोर्ट - वीजा बनवाने के लिए हमने भी अपनी अर्जी लगा दी।  बेटे ने हाथ में लिस्ट थमा दी- बापू यह सब जमा करना होगा।  पैन कार्ड, आधार कार्ड, आवास कार्ड, जन्म कार्ड, ......न जाने कितने कार्ड ?  जैसे इतने सारे कार्ड किसी विदेशी एटीम की कुंजी हो ?  उसे लगाने के बाद इंसानी जमीन में आप कदम रख सकतें हैं।  
                 हमने स्वयं अपने काम का बीड़ा  उठाया। सब कुछ मिला लेकिन जन्म प्रमाण पत्र  का दूर - दूर तक पता नहीं था।  माँ - बापू ने भी कभी   नहीं बनवाया , पहले यह सब कहाँ चलन में था। आज तक कहीं जन्म कार्ड का काम ही नहीं पड़ा. पहले के जमाने में बच्चे के  जन्म पर मिठाईयाँ  बाँटी जाती थी,  गांव भर को पता चल जाता था, बच्चा हुआ है।  हमने बहुत उत्साह से नगर निगम में अपनी अर्जी लगा दी .विदेश जाने की राह में कोई रोड़ा  नहीं होना चाहिए।   

  प्रणाम चौबे बाबू - यह हमारी अर्जी है "
ठीक है राम लाल  फॉर्म भर दो , दो चार दिन में सर्टिफिकेट ले जाना। 
 दिल बल्ले बल्ले हो गया, नयी सरकार में तेजी से काम हो रहें हैं।  लेकिन चार दिन बाद मनो घड़ा पानी हमारे सर के ऊपर पड़ा। 
 चौबे - भाई राम लाल जन्म प्रमाण पत्र नहीं मिल सकता है, यहाँ पुराने दस्तावेज जल चुके हैं "
            
                  हुआ यूँ कि  एक बार शहर भर में दंगा हुआ, दंगे में नगर निगम में भी आग लग गयी, गत कुछ वर्ष के दस्तावेज उस आग में स्वाहा हो गए, बदकिस्मती से हमरा जन्म भी उसी वर्ष में हुआ था. जिन वर्षों के दस्तावेजों की राख हमें मुँह चिढ़ा रही थी।  अब तो गयी भैंस पानी में... आग दस्तावेजों को लगी और पानी मै पी  रहा हूँ।  विगत दो वर्षों से अपने जीवित होने का साक्ष्य ढूंढ  रहा  हूँ. १२ वी पास होने का पुख्ता सबूत लेकर नगर निगम की चौखट पर  चप्पल घिस रहा हूँ।  लेकिन बात ही नहीं बनी, फाइल एक टेबल से दूसरे टेबल घूम रही है , कभी साहब नहीं तो कभी फाइल नहीं मिलती।   एक सर्टिफिकेट की वजह से विदेशी गंगा नहाने का काम खटाई में पड़ता नजर आ रहा था।  लेकिन  मुस्तैदी से अपने विकेट पर  तैनात था. कुछ भी हो सर्टिफिकेट बनवाना है ,मन में कीड़ा लग गया कि जन्म प्रमाण पत्र के बिना क्या हमारा अस्तित्व एक प्रश्न चिन्ह  लग सकता है।
                 
                    सरकारी दस्तावेजों की बात ही निराली होती है।  जो सामने है उसे सिरे से नकारते हैं, जो नहीं है उसे प्रेम से पुचकारते  हैं. जब से सरकार नए नियम कायदे लेकर आयी है, कायदे भी होशियार हो गए हैं, जीता जागता इंसान नहीं दिख रहा,  बेचारे को  मुर्दा घोषित करने पर तुले हैं। लेकिन हम हार मानने वालों में से नहीं।  फिर पहुँच गए नगर निगम चौखट पर। लेकिन इस बार वकील को साथ लेकर गए.
          आज कुर्सी पर चौबे जी मूँछो को ऐसे ताव दे रहें हैं जैसे ग्लू से चिपकी  मूंछ कहीं पोल न खोल दे। मुँख से टपकती धूर्तता चेहरे का नूर बनकर अपनी आभा बिखेर रही थी। पान चबाने के दिन भी बीते, अब पान खिलाने का नया शऊर चल रहा है। 
    "चौबे जी नमस्कार "
    " नमस्कार  भाई राम लाल कैसे हो ? "
 "जिन्दा हैं और जिन्दा होने का सबूत ढूँढ रहें है "
 "काहे मियां लाल - पीले हो रहे हो "
 " का कहें , दो वर्ष बीतने आ गए हमारा जन्म प्रमाण पत्र नहीं बना  रहें। "
" भाई हमने ऊपर बात की है कुछ जानकारी  दस्तावेज दिखाओ हम बना देंगे , जैसे  कहाँ जन्म हुआ ?  माता - पिता जी की शादी के प्रमाण पत्र, तुम्हारा जन्म किसने करवाया? कहाँ हुआ ? दायी ने जन्म करवाया या  अस्पताल  में ? माता -पिता कौन से घर में रहते थे , सभी जानकारी दो ....वैगेरह।
" अब यह जानकारी कहाँ से लाएं, जन्म प्रमाण पत्र हमें बनवाना है,  दस्तावेज  माता -  पिता के मांगे जा रहे हैं।  घोर अनर्थ है, दिमागी  घोड़े जितना दौड़ें उतना ही  कम है।  माँ बाबू परलोक सिधार गए, किराये के घर में रहते थे, डाक्टर भी कहाँ है दायी भी होगी तो मर गयी होगी, झूठ तो नहीं बोलेंगे। "
" देखिये, यह सरकारी कार्यवाही है, हम मजबूर हैं।"
" चौबे बाबू  काहे मजाक करत हो, हमरी उम्र देखकर कुछ तो सोचो,  अब सभी को परलोक के बुलाएँ का  ? माँ बाबू की शादी का प्रमाण आपके सामने बैठा है और आप क्या उजुल बातें कर रहे हो। अरे साहब, मार्कशीट है हमारी, उसी को देखकर जन्म  प्रमाण पत्र बनवा कर  हमें कागजों में जिन्दा कर दें ... हम जिन्दा होने का अहसास लेना चाहते हैं  वर्ना आत्मा  यूँ ही भटकती रहेगी "   

      "क्या करें राम लाल सरकारी खाना पूर्ति करनी होगी,  कुछ कोशिश करेंगे, अब जरा कुछ पान भी खिला दो "
       "ससुरा, मन हो या न हो हथेली कभी भी खुजलाने लगती है. पिछले दो वर्ष से पान खा खाकर होठ लाल हो गए लेकिन कागज पर दो अक्षर भी लाल नहीं हुए ... "
              खिन्न मन से जेब  में हाथ डाला तो बेचारी ऐसी फटी कि जो कुछ फँसा हुआ था वह भी बाहर छन्न करके गिर गया।   उम्र के इस मोड़ पर खुद को जीवित देखना अब जिद्द बन गयी थी.  बाहर जाने के लिए जाने कितने पापड़ बेलने बाकी थे। इधर वकील साहब भी बस जलेबी खाकर खिसिया देते हैं , आजकल फ़ोन पर ही   टरकाने लगे हमारी नगर निगम में पहचान है  करवा देंगे।  चार दिन बाद मिलना। 
  चार दिन जैसे चार बरस जैसे बीते, दस्तावेजों के अभाव में नगरनिगम  ने  प्रमाण पत्र देने से इंकार कर दिया। साथ जी नॉन एक्सिस्टेंस सेर्टिफिकेट जारी कर दिया कि फलां फलां व्यक्ति फलां सन में पैदा हुआ जिसे ब्यौरा यहाँ मौजूद नहीं है। 

          अब हमें काटो तो खून नहीं। लोगों ने सलाह दी कोर्ट जाओ हिम्मत मत हारो। फिर नियति की मार के चलते  कोर्ट में केस करने के बाद चप्पलें घिसघिस कर बदल गयी. लेकिन हम कागजों पर अजन्मे ही रहे। तारीखें  बदलती रही ,उम्र छलती रही।  हम सीधे साधे बेचारे सरकारी दॉँव पेंच में ऐसे फंसे कि खुद को मुर्दा ही समझने लगे।  खुद को आईने में देखकर डरने लगे कोई  भूत देख लिया हो। अजन्मे होने का ख्याल मन को खाने लगा है। दिल के दरवाजे पर  जंग वाला ताला लग गया.  राह चलते ऐसा प्रतीत होता जैसे कि मै वह भटकती आत्मा हूँ जिसे इंसान प्रश्न वाचक निगाहों से देख रहें है।  न घर का, ना घाट का,  मै बहता पानी  जो न जाने कौन से दरिया में जाकर मिलेगा।  
   सरकारी दफ्तर  में खुद को तलाशता हुआ  अजन्मा  प्राणी, एक रुका हुआ फैसला।  जिस फैसले के इन्तजार में कहीं फ्रेम न बन जाऊं। हाँ भाई, सरकारी दस्तावेजों के आभाव में  मेरे जन्म को सिरे से नकार कर जैसे मुझे प्रेत योनि में भेज दिया हैं.
  कहावत है  " न सौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी "  राधा का  पता नहीं पर  तेल की धार जरूर  हवा का रुख देखकर बहने लगी हैं. तेल भी जब बाती के संग हो तब उसका जलना नियति है,  बेटा तो पहले ही विदेश में मग्न था अब उसने भी तेल डालना बंद कर दिया।  "
मदद करना तो दूर कहने लगा -- हिम्मत रख बापू सब अच्छा होगा।  "
            अच्छे वक़्त का तो पता नहीं लेकिन वकील, कोर्ट  और सरकारी दफ्तरों में  मै  जरूर  घुन की तरह पीस रहा हूँ।  कभी कभी ख्याल आता है कि जन्म प्रमाण पत्र नहीं है तब किसी को मेरा मृत्यु  प्रमाण पत्र लेने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।  जब कागजी जन्म नहीं तब कागजी  मृत्यु कैसी?        
                हमारे पडोसी शर्मा जी के भाई को परलोक सिधारे  हुए करीब एक वर्ष बीत गया, उनकी  आत्मा मृत्यु प्रमाण पत्र हेतु भटक रही है क्यूंकि  परिजन सरकारी अफसर की जेब व दस्तावेजों की पूर्ति करने में असमर्थ हो गए थे।         

              उम्र के इस पड़ाव पर मैंने घुटने टेक दिए, अजन्मे होने साथ  खुद की तस्वीर पर मृत्यु प्रणाम पत्र न लगाने की अंतिम ख्वाहिश भी चिपका दी,  दिल भटकती रूह से भी नाता तोड़ने को बेक़रार है। विदेश गंगा तो नहीं हमने देशी गंगा नहाकर ही खुद को धन्य कर लिया। आप कभी हमसे मिलना चाहो तो हमारी रूह खुद को कागजों में तलाशती मिल जाएगी। अजन्मा होने की  पीर जन्मे  होने की पीड़ा से कहीं ज्यादा प्रबल है. कोई यदि हमसे मिलना चाहें तो हम वहीँ  नगरनिगम की चौखट पर या सरकारी दस्तावेजों में खुद का वजूद ढूंढते मिल ही जायेंगे। सरकारी दस्तावेज में  उलझकर मेरी आत्मा चीख चीख कर कह रही है, मै मुर्दा नहीं  .......! 
-- शशि पुरवार  

Monday, June 5, 2017

फेसबुक पर महिलाओं की प्रॉक्सी

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  नयन मटक्का इस बार बेहद खास बन गया है, महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी गुणवत्ता प्रदर्शित कर रहीं हैं। सर्वप्रथम महिला सम्पादिका को बधाई और पत्रिका के संपादक को भी बधाई, उन्होंने एक महिला को यह कार्य सौंप कर समानता  के अधिकार का सार्थक उपयोग किया है।    सोशल मीडिया पर भी महिलाओं ने पुरुषों के अधिपत्य को तोड़कर अपना परचम लहराया है।            
             फेसबुक पर महिलाओं की प्रॉक्सी? मतलब महिलाओं का फेसबुक पर भी इतना बोलबाला हो गया है कि  तथाकथित मर्द अब फेक आई डी बनाकर प्रॉक्सी देने लगे हैं. उनकी दबी हुई यानि कि दमित इच्छाएं भी महिलाओं की चौखट पर दम तोड़ने लगीं हैं. आखिर   हर बार पुरुषों को महिलाओं की चौखट ही मिलती है।  तथाकथित मर्द फेक अकाउंट द्वारा अपने दूषित विचारों की लीपा पोती करतें है।   ऐसा प्रदुषण  ज्यादा देर कहाँ छुपता है।  
      हमारे पडोसी को दीवारों में कान लगाने की बुरी लत लगी हुई है,  तब तक आँखें न सेंके, कान को गर्म न करें, चुगलियां न करे,  हाजमा ख़राब हो जाता है। दिन रात एक एक बात को प्याज के छिलके उतारकर पूछना और उसका ढिंढोरा पीटना। जनाब की इस लत का शिकार पडोसी के साथ उनके घर वाले भी है।  एक भी दिन भी अगर पटाखा  न जले तो कालोनी में सूनापन महसूस होने लगता है। कुछ मर्द महिलाओं के प्रति कुछ ज्यादा लगाव महसूस करतें है इसीलिए हाव भाव भी उसी तरह रखतें हैं।  तथाकथित पुरुष वर्ग उन्हें पीठ पीछे बायको  ( महिला ) कहकर सम्बोधित करता है। लो जी यहाँ भी महिला की चौखट पर ही बलि चढ़ी।  बिना बात के बेचारी महिला ही सूली चढ़ती है।  आखिर कहीं  तो सर छुपाने की जगह होनी चाहिए। इसीलिए शायद हर जगह पुरुष प्रॉक्सी का सहारा लेते हैं। 
  
     व्यंग्य क्षेत्र  पर  भी मुख्यतः पुरुषों का आधिपत्य था. चाटुकारिता का ठीकरा  महिलाओं के सर पर फोड़कर  पुरुष बखूबी अपनी भूमिका निभा रहे थे। व्यंग्य लेखन में महिलाओं की स्थति पहले नगण्य थी लेकिन इसमें तेजी से इजाफा होने लगा, सोशल मीडिया को हथियार बनाकर कई बुद्धिजीवी महिलाओं ने हाथ में  हथियार थाम लिए. एकाएक कटाक्षों की बारिश होने लगी, कटाक्ष और व्यंग्य एक दूजे से  पृथक कहाँ है. पुरुषों ने सदा से महिलाओं को व्यंग्य वाणों हेतु बदनाम कर रखा था। तो लीजिये यही व्यंग्य वाण अब अपनी लीला दिखा रहें है. 
             सोशल मीडिया ने  कलमकारों की धार तेज करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है कहना गलत न होगा।  पहले चौपाल पर चाटुकारिता होती थी अब सोशल मीडिया एक चौपाल बनकर उभरी है।  स्वतंत्र देश के नागरिक सभी अपनी बात कहने हेतु स्वतंत्र है।
     
             हमारे शर्मा जी को अपने व्यंग्यकार होने पर बहुत गुमान था।  दिन रात पत्नी की खिल्ली उड़ाना उनके व्यंगय  लेखन का  प्रमुख अंग था. स्वतंत्र विचारों व विशाल हृदय की स्वामिनी उनके इस अंदाज पर मुस्कान बिखेरती थी, लेकिन शर्मा जी को कोई उनका मजाक बनाये पसंद नहीं था। महिलाओं का मजाक बनाना वह एक छत्र राज समझते थे।  
      
                  हमारे शर्मा जी की पत्नी भी किसी कुशल व्यंग्यकार  से कम नहीं है, देखा जाये तो शर्मा जी को उन्ही ने व्यंग्यकार बनाया है, उनके कुशल वाणों के द्वारा ही  शर्मा जी सफल व्यंग्यकार बने हैं, उनकी सफलता का श्रेय उनकी पत्नी को भी जाता है। हमें लगता है  व्यक्ति की सफलता के बीज उनकी अपनी धरती  पर ही बिखरे होतें हैं।

लेकिन शर्मा जी को पसंद नहीं कोई उनकी पत्नी की तारीफ करे. मर्द के अहम् को ठेस पहुँचती है। 
 एक दिन  हमने जब शर्मा जी से कहा - भाई, भाभी जी  को कहो कुछ लिखा करें।     
कहने लगे भाई - जान की भीख मांगता हूँ, मै अकेला भी उन्हें पढ़ने सुनने के लिए बहुत हूँ।  मेरी जान बख्शो भाई। ऐसी सलाह अपने घर में ही रखा करो।  हमें ऐसा लगा एक  सफल नामचीन व्यंग्यकार पत्नी के आगे बिसात की तरह बिछ गया। कुछ गड़बड़ है। प्रकृति की शक्ति का  अंदाज शर्मा जी को भी होगा।  
 एक दिन  की बात है - एक समारोह देखते हुए अति बुद्धिजीवी शर्मा जी की जीभ फिसल गयी, अहम् बोलने लगा  - 
" महिलाएं क्या व्यंग्य लेखन करेंगी ? वह घर में ही अच्छी लगती हैं."
कोई दूसरा कुछ बोले उसके पहले  बगल में बैठी उनकी पत्नी को पर सब नागबार गुजरा. बिफर पड़ी -   
  "आपने महिलाओं को क्या समझा है "
आवाज मिमिया गयी - " कुछ नहीं भाग्यवान ,महिलाएं कितनी अच्छी  होती हैं। .."
"अभी तुमने जो कहा वह क्या था ? और महिलाएं कितनी अच्छी से क्या तात्पर्य है, कितनी महिलाओं को जानते हो ",
 आँखे तरेर कर पूछा तो शर्मा जी एकदम गऊ बन गए। समझ गए खुद के झाल में फँस गए।  
" पुरातन समय से महिलाओं  को देवी का दर्जा दिया है। वे पूज्यनीय है, तुम न होती तो हम कहाँ होते ? तुमसे ही परिहास करके,  तुम पर चुटकुले बना कर, तानों को मूर्त रूप देकर ही व्यंग्य लिखता हूँ "
"अच्छा तो हम कोई वस्तु है, जिस पर चुटकुले लिखो "  स्वयं पर ताना समझकर थोड़ा सा  अपराध बोध  का स्टेशन  मन में आया किन्तु भावभंगिमा खा जाने वाली ट्रैन चला दी, पहले की नारी होती तो चुप सुन लेती लेकिन आज महिलाएं सजग हो गयी हैं। भाव - भंगिमा देखकर घबराकर शर्मा जी  बोले - 
 "यह सब लेखन की बातें है, शिल्प, कथ्य, बिम्ब ..अनेक बिंदु पर काम करना होता है...... दिन रात उनके बारे में सोचो फिर ...."आगे की बात मुँह में घुलकर रह गयी। 
"अच्छा अब समझी, कहाँ मशग़ूल रहते हो। बोल कालिया कितनी बिंदु तेरे पास में है ?  किसके  साथ लीला कर रहे हो?  तभी घर में  कदम नहीं टिकते  हैं, बताओ कहाँ मिलते हो इन सभी बिंदुओं से। .उफ़ कितनी आवारगी है ....."
"अरे भगवान् क्या बोल रही हो, समझो तो सही "
" सब  समझती हूँ, बन्दर के दाँत खाने के अलग होते हैं दिखाने के अलग ....यह झुनझुना कहीं और बजाना। .....  पत्नी की सेवा करो तभी मेवा मिलेगा। पत्नी जी मुस्कुरा कर आगे बढ़ गयी।  
आज उपवास रखने का समय आ गया था। शर्मा जी कलम लेकर कागज फाड़ते नजर आये। मीडिया पर खिसियानी बिल्ली की तरह पोस्टों को नोचने लगे। 
     शर्मा जी ने खिसकने में ही अपनी भलाई नजर आयी, लेकिन अगले  दिन से सोशल मीडिया पर नए व्यंग्यकार का अवतरण हो गया था, शर्मा जी की खास प्रतिद्वंदी बनकर उभरी उनकी पत्नी अब हर तरफ छायी हुई थी. शर्मा जी समझ चुके थे, पानी में रहकर मगर से  बैर नहीं करना चाहिए। चलिए शर्मा जी के साथ फिर मिलेंगे।  तब तक आप भी अपने घर में सोई हुई प्रतिभा को रास्ता दिखाएँ। जय हो 
शशि पुरवार 

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